"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय | धीमहि तन्नः परशुराम: प्रचोदयात् ||"

ब्लॉग
डिजिटल युग में युवाओं के लिए आवश्यक कौशल

डिजिटल युग में युवाओं के लिए आवश्यक कौशल

08 Aug 2026 ABBEP Super Admin 5

डिजिटल युग में तकनीकी और व्यवहारिक कौशल युवाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के अवसर तेजी से तकनीक पर निर्भर होते जा रहे हैं। भारत की आबादी में 25 वर्ष से कम आयु के लोग आधे से अधिक हैं, इसलिए उनकी डिजिटल क्षमता को सशक्त बनाना राष्ट्रीय महत्व की प्रक्रिया है। सरकार ने “डिजिटल इंडिया” एवं “स्किल इंडिया” जैसे अभियानों के माध्यम से डिजिटल शिक्षा और प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया है।

डिजिटल कौशल की परिभाषा और प्रासंगिकता

21वीं सदी में तीव्र प्रौद्योगिकीय परिवर्तन से युवाओं के शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक अवसरों में नए आयाम खुल रहे हैं। डिजिटल साक्षरता का अर्थ है कंप्यूटर और इंटरनेट जैसे उपकरणों का कुशल उपयोग करना – जैसे ईमेल भेजना, ऑनलाइन सेवाएँ लेना, सूचना खोजना, कैशलेस लेन-देन करना आदि। भारत में स्मार्टफोन व इंटरनेट की पहुँच तेजी से बढ़ी है; ग्रामीण इलाकों में भी अधिकांश किशोरों के घर में स्मार्टफोन है। इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए डिजिटल साक्षरता अनिवार्य बन गई है। सरकार ने “डिजिटल इंडिया” मिशन के तहत सार्वभौमिक डिजिटल साक्षरता को प्राथमिकता दी है। 2015 में शुरू हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) के तहत आज तक लगभग 5.01 करोड़ ग्रामीणों को पंजीकृत कर 4.21 करोड़ को प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें से 52% महिलाएँ हैं। इस तरह की पहलें डिजिटलीकरण के फायदों को दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में सहायक हैं। यथार्थ यह है कि रोजगार और उद्यमिता के लिए युवाओं का तकनीकी कौशल और डिजिटल माहिरता 21वीं सदी की दक्षताओं में शामिल है। UNESCO की रिपोर्ट भी बताती है कि भारत की युवा आबादी (50% जनसंख्या 25 वर्ष से कम) को कौशल आधारित प्रशिक्षण देकर रोजगारपरक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।

आवश्यक तकनीकी और व्यवहारिक कौशल

  • डिजिटल साक्षरता एवं आईटी बुनियाद: कंप्यूटर/स्मार्टफोन चलाना, ऑपरेटिंग सिस्टम की समझ, इंटरनेट व ईमेल उपयोग, ऑफिस सॉफ़्टवेयर (जैसे वर्ड, एक्सेल, प्रेजेंटेशन) में दक्षता। ये कौशल सभी आधुनिक रोजगारों की आधारशिला हैं।
  • कोडिंग एवं वेब विकास: प्रोग्रामिंग (जैसे पायथन, जावा, C++) तथा HTML/CSS/JavaScript जैसे वेब विकास तकनीकों का ज्ञान आज के सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बेहद मांग में है। ये कौशल सॉफ्टवेयर विकास, ऐप निर्माण और फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी हैं।
  • डेटा साक्षरता: डेटा विश्लेषण (जैसे Excel, Tableau, SQL), आँकड़ों को समझना और उनमें से इनसाइट निकालना, डाटा विज़ुअलाइज़ेशन करना – ये व्यवसायों में निर्णय लेने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • डिजिटल मार्केटिंग: SEO, SEM, सोशल मीडिया प्रबंधन, कंटेंट मार्केटिंग, ईमेल मार्केटिंग आदि कौशल से युवा स्वयं का या अन्य का व्यवसाय ऑनलाइन बढ़ा सकते हैं। जैसे-जैसे कंपनियाँ ऑनलाइन ग्राहक जुटा रही हैं, डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञों की मांग बढ़ रही है।
  • साइबर सुरक्षा की समझ: पासवर्ड सुरक्षा, फ़िशिंग हमलों से बचाव, नेटवर्क सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी ज्ञान आदि का होना अब हर कार्यस्थल में अपेक्षित है। आधारभूत साइबर सुरक्षा जागरूकता के साथ-साथ सुरक्षा टूल्स की जानकारी युवा नौकरियों के लिए लाभदायक होगी।
  • क्लाउड कंप्यूटिंग एवं उभरती तकनीकें: AWS/Azure/GCP जैसे क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म के आधारभूत ज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग की समझ, डेटा साइंस व IoT जैसी तकनीकों की जानकारी भविष्य की नौकरियों के लिए प्रासंगिक हैं।
  • व्यवहारिक (सॉफ्ट) कौशल:
    • संचार कौशल: स्पष्ट बोल-चाल और लेखन क्षमता, सुनने की कुशलता और विभिन्न माध्यमों (ऑनलाइन मीटिंग्स, ईमेल, टीम कॉल) में संवाद करना।
    • टीमवर्क एवं नेतृत्व: समूह में सहयोग करना, विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना, नेतृत्व और प्रेरणा प्रदान करना।
    • समस्या-समाधान एवं आलोचनात्मक सोच: जटिल समस्याओं का विश्लेषण कर उनका हल ढूँढना, नवाचारी विचार लाना।
    • अनुकूलनशीलता (अडैप्टबिलिटी): बदलाव को स्वीकृति और त्वरित सीखने की इच्छा रखना।
    • डिजिटल नैतिकता: ऑनलाइन व्यवहार की समझ, गोपनीयता और बौद्धिक संपदा का सम्मान करना।
    • समय प्रबंधन: कार्यों को प्राथमिकता देना और समयसीमा में काम पूरा करना।
      ये व्यवहारिक कौशल तकनीकी दक्षता को प्रभावी बनाते हैं और रोजगार में सफलता सुनिश्चित करते हैं।

कौशल से करियर-पथ और क्षेत्रीय मिलान

डिजिटल कौशलों के आधार पर युवाओं के लिए कई करियर अवसर उपलब्ध हैं:

  • सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और सॉफ्टवेयर: कोडिंग, सॉफ़्टवेयर डेवलपमेंट, वेब/ऐप विकास, DevOps, क्लाउड एडमिनिस्ट्रेशन—इन क्षेत्रों में विकास की लगातार मांग है। जैसे-जैसे कंपनियाँ नवाचार पर ध्यान देती हैं, AI/ML और डेटा साइंस विशेषज्ञों की भूमिका बढ़ी है।
  • शिक्षा और प्रशिक्षण: ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म और एजटेक इंडस्ट्री में डिजिटल कंटेंट निर्माण, ऑनलाइन कोर्स डेवलपमेंट, आभासी कक्षाएँ संचालित करना। शिक्षण संस्थान डिजिटल कक्षाएँ और लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) का अधिक उपयोग कर रहे हैं।
  • सरकारी क्षेत्र एवं ई-गवर्नेंस: डिजिटल इंडिया पहल, ई-प्रशासन, साइबर सुरक्षा एजेंसियाँ, डिजिटल साक्षरता मिशन आदि में प्रशासनिक और तकनीकी भूमिकाएँ। युवाओं को सरकारी सेवाओं में सूचना प्रौद्योगिकी की समझ उपयोगी होगी।
  • उद्यमिता और फ्रीलांसिंग: ई-कॉमर्स, ऑनलाइन विपणन, डिजिटल सेवा मुहैया कराना (जैसे ग्राफिक डिज़ाइन, कंटेंट राइटिंग, SEO सेवाएँ)। कौशल होने पर स्वयं व्यवसाय खड़ा करना या फ्रीलांस प्रोजेक्ट लेना आसान होता है।
  • वाणिज्य एवं बैंकिंग (BFSI): डिजिटलीकृत बैंकिंग सिस्टम और वित्तीय सेवाओं के विस्तार से तकनीकी-गणितीय और ग्राहक-संपर्क कौशल वाले पेशेवरों की मांग बढ़ी है।
  • हॉस्पिटैलिटी एवं पर्यटन: डिजिटल बुकिंग, सोशल मीडिया मार्केटिंग, ग्राहक अनुभव डिज़ाइन जैसे कार्यों में कौशल का उपयोग। क्षमता अनुसार होटल प्रबंधन, फ्रंट डेस्क, कस्टमर केयर जैसे पाठ्यक्रमों के बाद रोजगार संभव है।
  • हरित प्रौद्योगिकियाँ और निर्माण क्षेत्र: सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, उन्नत निर्माण तकनीकों में तकनीकी प्रशिक्षण। सरकार के ‘PLI’ जैसे कार्यक्रमों से रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में कुशल श्रमिकों की मांग बढ़ी है।
  • गैर-सरकारी क्षेत्र (NGO) एवं सामाजिक सेवाएँ: डिजिटल अभियानों, डेटा संग्रह/विश्लेषण, वित्तीय साक्षरता, ICT4D प्रोजेक्ट्स में रोजगार। उदाहरणतः सर्वेक्षण डेटा प्रबंधन या समुदाय-आधारित डिजिटल प्रशिक्षण अभियानों के लिए कौशल जरूरी है।

इन क्षेत्रों में कौशल का विन्यास बदलता रहता है। उदाहरण के लिए, कोविड के बाद दूरस्थ (वर्क-फ्रॉम-होम) मॉडल में दूरस्थ सहयोग उपकरण (जैसे Zoom, Teams) का ज्ञान, ऑनलाइन प्रोजेक्ट मैनेजमेंट स्किल्स भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। रिटेल तथा BFSI क्षेत्र में ग्राहक संवाद, उत्पाद ज्ञान और डिजिटल साक्षरता की मांग विशेष रूप से टियर-2/3 शहरों में बढ़ी है।

में स्पष्ट किया गया है कि सभी क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता (स्मार्टफोन, बैंकिंग ऐप्स, ईमेल, उत्पादकता टूल्स) एक अनिवार्य आधार बन चुकी है, और ग्रामीण क्षेत्रों में इस मूलभूत कौशल को विकसित करना बेहद आवश्यक है।

सीखने के मार्ग (शिक्षा एवं प्रशिक्षण विकल्प)

युवा और गैर-लाभकारी संगठन निम्न माध्यमों से डिजिटल कौशल सीख सकते हैं:

  • सरकारी कार्यक्रम और पोर्टल: सरकार ने Skill India Digital Hub (SIDH) नामक एक मोबाइल-पहचान केंद्रित प्लेटफ़ॉर्म बनाया है, जिसमें कौशल प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन, रोजगार और उद्यमिता सेवाएँ एकीकृत हैं। SIDH पर PMKVY, NAPS, JSS और SOAR जैसे योजनाओं के अंतर्गत लाखों युवाओं ने कोर्स किये हैं। उदाहरणतः SOAR (Skill for AI Readiness) पहल में AI बेसिक पाठ्यक्रमों के तहत 4.96 लाख शिक्षार्थी नामांकित हुए।
  • Futureskills Prime: नासकॉम और इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय द्वारा स्थापित सरकारी पोर्टल, जिसमें 500+ पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। 2025 तक 15.78 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने इसमें नामांकन किया, जिनमें 41% महिलाएँ थीं। यहां नए-नए तकनीकों (AI, साइबर सुरक्षा, क्लाउड आदि) की ऑनलाइन पाठ्यक्रम सामग्री मिलती है।
  • मुफ्त/सशुल्क ऑनलाइन मंच: SWAYAM (MHRD), DIKSHA (NCERT), Coursera, edX, Udemy, Khan Academy आदि पर हजारों डिजिटल स्किल कोर्स उपलब्ध हैं। इन पर आवेदन करके युवा अपने समयानुसार प्रशिक्षण ले सकते हैं। उदाहरण के लिए Google Digital Unlocked से डिजिटल मार्केटिंग, Microsoft Learn से क्लाउड/AI, कोडिंग सीखने को उत्कृष्ट संसाधन हैं।
  • प्रमाणपत्र और डिप्लोमा: NIELIT (CCC/BCC/O Level), NIIT इत्यादि संस्थानों से कंप्यूटर सर्टिफिकेट्स; भारतीय कंप्यूटर सोसाइटी, MCX इत्यादि से विभिन्न कंप्यूटर पाठ्यक्रम. ये प्रमाणपत्र औपचारिक मान्यता देते हैं।
  • शैक्षणिक संस्थान: इंजीनियरिंग/आईटीआई कॉलेज, Polytechnics अपनी वार्षिक पाठ्यक्रम में डिजिटल कौशल शामिल कर रहे हैं। तकनीकी महाविद्यालयों में विशेष उन्नत पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं।
  • अन्य स्रोत: CSR कार्यक्रमों (जैसे TCS आई-ऑन, L&T एसटीआई), Yuvika इंटर्नशिप, UNDP व NGO प्रोजेक्ट्स में मेंटरशिप। स्थानीय उद्यमिता कार्यक्रम (Startup Incubators) व सरकारी व्यापार इम्पुल्स योजना से भी मार्गदर्शन मिलता है।
    इस प्रकार कई विकल्प उपलब्ध हैं – सरकारी योजनाएँ (जैसे PMKVY, PMGDISHA, SOAR), निजी शिक्षण संस्थान, और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म युवाओं को डिजिटल कौशल सिखाने में योगदान दे रहे हैं।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए व्यावहारिक कदम

युवा स्वयं और ABBEP जैसी एनजीओ निम्नलिखित चरणों से प्रशिक्षण कार्यक्रम चला सकते हैं:

  • ज़रूरत का आंकलन और पाठ्यक्रम निर्माण: स्थानीय समुदाय में कौशल की कमी की पहचान करें। पात्रता अनुसार मॉड्यूल तैयार करें – जैसे “डिजिटल साक्षरता कक्ष” (बेसिक कंप्यूटर, इंटरनेट), “सॉफ्टवेयर ट्रेनिंग”, “डिजिटल मार्केटिंग” आदि। उद्योग की माँग को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम बनाएं।
  • अवधि एवं डिलीवरी: बुनियादी प्रशिक्षण (जैसे कंप्यूटर परिचय, MS Office) 1–3 महीने में पूरा किया जा सकता है, जबकि कोडिंग या डेटा साइंस जैसे पाठ्यक्रमों के लिए 6–12 महीने लग सकते हैं। डिलीवरी का तरीका भिन्न हो सकता है: कक्षाएं (ऑफ़लाइन), ऑनलाइन लाइव सेमिनार, या संयोजित मॉडल (ब्लेंडेड लर्निंग)। मोबाइल ऐप्स और यूट्यूब ट्यूटोरियल्स से आत्म-अध्ययन को प्रोत्साहित करें।
  • प्रशिक्षक एवं संसाधन: प्रशिक्षकों को उद्योग-योग्य बनाएँ (उदाहरण: प्राथमिक प्रशिक्षण देने से पूर्व स्वयं FutureSkills/AWS जैसे कोर्स कराएँ)। कमप्यूटर लैब या लैपटॉप/टेबलेट उपलब्ध कराएँ। सरकारी संस्थाओं (ITIs, जिला स्किल सेंटर) या निजी संगठनों से साझेदारी करें ताकि एडमिनिस्ट्रेटिव सहायता मिले। उदाहरण के लिए OES ने HDFC Parivartan, ITC जैसी कंपनियों से साझेदारी कर प्रशिक्षण केंद्र चलाए हैं।
  • मूल्यांकन एवं प्रमाणन: कोर्स के अंत में लिखित या प्रैक्टिकल परीक्षा लें। सफलता पर राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सर्टिफिकेट दें। Skill India या NSDC से संबद्धता के तहत सरकारी मान्यताप्राप्त प्रमाणपत्र बड़े प्रभावी होते हैं।
  • नियुक्ति और अनुवर्ती सहायता: उद्योग संपर्क बनाएं; इंटर्नशिप तथा प्लेसमेंट इंजन तैयार करें। कोर्स खत्म होने पर विद्यार्थी को रोजगार या उद्यमिता की दिशा में मार्गदर्शन दें। उच्च-प्रभावी मॉडल में प्रशिक्षण से पूर्व नियोक्ताओं से फीडबैक लेकर पाठ्यक्रम तैयार होते हैं, और प्लेसमेंट के 6–12 महीने बाद तक अनुवर्ती संबंध बनाए रखे जाते हैं।
  • बजट: एक औसत छोटे कार्यक्रम का बजट प्रशिक्षुओं की संख्या पर निर्भर करता है। उदाहरणतः 30 छात्रों के 3-महीने के कोर्स पर प्रशिक्षक, उपकरण व सामग्री सहित ₹2–5 लाख तक खर्च आ सकता है; पर बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाओं में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। ABBEP जैसे एनजीओ शुरुआत में स्थानिक संसाधनों (पहाड़े, पंखे, प्रोजेक्टर) का उपयोग कर छूटे बजट में प्रोग्राम चला सकते हैं। बाद में CSR और सरकारी अनुदान से विस्तार किया जा सकता है।

उपरोक्त फ्लोचार्ट में प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक सामान्य कार्यप्रवाह दर्शाया गया है: क्षमता आकलन से लेकर पाठ्यक्रम विकास, प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्लेसमेंट तथा बाद की निगरानी तक।

सफलता के उदाहरण (केस स्टडी)

  • सरकारी पहल (PMKVY): प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के तहत 2015 से अब तक 1.42 करोड़ से अधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इससे असंख्य युवाओं को सर्टिफिकेट मिला और कई को रोजगार भी।
  • Skill India Digital Hub: SIDH प्लेटफ़ॉर्म पर विभिन्न योजनाओं के तहत पंजीकरण करने वाले युवाओं की संख्या करोड़ों में है। उदाहरणतः SOAR कार्यक्रम में 4.96 लाख नामांकन और 98,576 प्रमाणन हुए। ये आँकड़े सरकारी प्रयासों की विशालता दिखाते हैं।
  • FutureSkills Prime: नासकॉम ने बतायाकि 2025 तक 15.78 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने इस पोर्टल पर कोर्स किए हैं, जिनमें 41% महिलाएँ और 85% प्रतिभागी छोटे शहरों से हैं। इसने ग्रामीण/टीयर-2 जगहों के युवाओं को उन्नत तकनीकी शिक्षा उपलब्ध कराई।
  • एनजीओ उदाहरण (Orion): ऑरियन एजुकेशनल सोसाइटी ने 18 वर्षों में 29 राज्यों में 100+ प्रशिक्षण केंद्र खोले और 1.37 लाख से अधिक प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया। ये कार्यक्रम होटल, खुदरा, BFSI, आईटी जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं। OES के ट्रैक रिकॉर्ड ने दिखाया कि स्थानीय उद्योग की ज़रूरत के मुताबिक प्रशिक्षण देने से प्लेसमेंट दरें राष्ट्रीय औसत से बेहतर होती हैं।
  • एनजीओ उदाहरण (Smile Foundation STeP): स्माइल फाउंडेशन का STeP प्रोग्राम 8 राज्यों में चलकर 9,000 से ज़्यादा युवाओं को प्रशिक्षित कर चुका है, और इनमें से 5,500 से अधिक को स्थायी रोजगार मिला है। इससे दिखता है कि उद्योग-सहयोगी प्रशिक्षण प्रभावी परिणाम दे सकता है।
  • नापेक्स (India Skills Report 2026): भारतीय युवाओं की रोजगारतज्ञता में सुधार दिखाया गया है – 2026 रिपोर्ट के अनुसार जॉब-रेडी युवाओं का अनुपात 43% से बढ़कर 56.35% हो गया है। हालांकि अभी भी 43% युवा नौकरी के लिए तैयार नहीं माने गए, लेकिन पूर्व की तुलना में प्रगति स्पष्ट है। यह सुधार कुशल प्रशिक्षण प्रयासों का प्रतिफल है।
    इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समन्वित प्रयासों (सरकारी योजनाएं + एनजीओ) से व्यापक स्केल पर कौशल विकास और परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

चुनौतियाँ और समाधान

डिजिटल कौशल प्रशिक्षण में कई चुनौतियाँ हैं, जिन्हें सामंजस्यपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए:

  • डिजिटल विभाजन (Digital Divide): दूर-दराज के ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिवाइस और बुनियादी सुविधाएँ सीमित हैं। उदाहरणतः ASER रिपोर्ट बताती है कि 14–16 वर्ष के ग्रामीण युवाओं में स्मार्टफोन की उपलब्धता और स्वामित्व में लिंग के आधार पर अंतर है। लड़के-स्मार्टफोन का प्रयोग लड़कियों की तुलना में अधिक करते हैं। इससे डिजिटल कौशल की सीखने में लड़कियों को बाधा आती है।
  • शिक्षा एवं भाषा अवरोध: बहुलता वाले भारत में प्रशिक्षण सामग्री को हिंदी और अन्य स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराना चुनौती है। अंग्रेज़ी-केन्द्रित कोर्स में ग्रामीण युवा पिछड़ सकते हैं।
  • लैंगिक असमानता: सामाजिक बाधाएँ, सुरक्षा चिंताएँ, और पारिवारिक प्रतिबद्धताएँ महिलाओं को करियर प्रशिक्षण से दूर रख सकती हैं। उदाहरणतः Orion अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं को प्रशिक्षण देने के बाद उनकी नौकरी में बनी रहने की दर पुरुषों से कम है।
  • बुनियादी संरचना: उच्च गति की इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिवाइस की किफायती उपलब्धता हर गांव में नहीं है। बिजली कटौती व अधूरा नेटवर्क प्रशिक्षण बाधित कर सकते हैं।
  • रूढ़िवादी धारणाएँ: कुछ परिवार और समुदाय पारंपरिक रोजगार (खेती, पारंपरिक व्यवसाय) को प्राथमिकता देते हैं और तकनीकी शिक्षा का महत्व नहीं समझते।

इन चुनौतियों के निवारण उपाय भी किए जा रहे हैं:

  • सरकारी पहलें: PMGDISHA जैसे अभियानों ने 2018 तक 4.21 करोड़ ग्रामीणों को डिजिटल रूप से प्रशिक्षित किया, जिनमें 52% महिलाएँ शामिल थीं। इससे ग्रामीण महिलाओं को भी डिजिटल साक्षरता मिली। सरकार ग्राम पंचायतों, CSC (कॉमन सर्विस सेंटर) एवं स्कूलों के माध्यम से सामुदायिक प्रशिक्षण कार्यशालाएँ चला रही है।
  • बहुभाषी सामग्री: प्रशिक्षण सामग्री और ऐप्स को हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जा रहा है। डिजिटल इंडिया ऐप्स और वीडियो गाइड अक्सर हिंदी/अन्य भाषाओं में होते हैं।
  • महिला-केंद्रित कार्यक्रम: विशेष महिला प्रशिक्षण शिविर, ऑनलाइन मॉड्यूल (जिनमें शिशु देखभाल एवं लचीले समय की सुविधाएँ हों) चलाकर लैंगिक अंतर को पाटने की कोशिश है। इससे महिलाओं को सुरक्षा और सहूलियत मिलती है।
  • इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधार: फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क (भारतनेट) के विस्तार, सस्ते इंटरनेट योजनाओं (जैसे मुफ्त डेटा योजनाएँ) से कनेक्टिविटी बढ़ रही है। बेसिक इलेक्ट्रॉनिक संरचना पर भी निवेश हो रहा है।
  • जागरूकता अभियान: गांव-देहात और सामाजिक मंचों पर डिजिटल शिक्षा के महत्व को बढ़ावा दिया जा रहा है। सफ़लता कहानियाँ (जैसे NDTV ने लड़की सीखकर नौकरी पाने की कहानियाँ) ग्रामीण युवाओं को प्रेरित करती हैं।
  • दलित/जनजातीय/दिव्यांग समावेश: निशित वर्गों के लिए विशेष कोर्स और अनुदान योजनाएँ (जैसे एससी/एसटी छात्रवृत्ति) हैं।

इन प्रयासों से डिजिटल डिवाइड घटाने की ओर बढ़ोतरी हुई है। उदाहरणतः PMGDISHA ने ग्रामीण महिलाओं को प्राथमिकता दे कर 52% पंजीकरण में महिला सहभागिता की, जिससे लैंगिक अंतर कम हुआ। इसी प्रकार OES जैसे NGOs ने प्रशिक्षण केंद्रों को 5 किमी के भीतर रखने पर जोर दिया, ताकि दूर-देहात की महिलाओं को सुविधाजनक पहुँच मिल सके। अतः चुनौतियों के समाधान में सरकारी-निजी साझेदारी, सामुदायिक सहभागिता और समावेशी दृष्टिकोण आवश्यक हैं।

प्रगति के संकेतक (KPIs) और निगरानी

प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता मापने के लिए निम्न प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPIs) उपयोगी हो सकते हैं:

  • नामांकन एवं पूर्णता दर: कितने युवाओं ने कोर्स में दाखिला लिया और उनमें से कितने ने कोर्स पूरा किया।
  • प्रमाणन हासिल करने वालों की संख्या: कोर्स सफलतापूर्वक पूर्ण कर प्रमाणपत्र पाए प्रतिभागियों की संख्या।
  • रोजगार/प्लेसमेंट दर: पाठ्यक्रम समाप्ति के बाद कितने प्रतिशत प्रशिक्षणार्थी को रोजगार या आगे की पढ़ाई मिली। प्रभावी कार्यक्रमों में यह दर 80% से ऊपर होनी चाहिए। Orion की रिपोर्ट के अनुसार उच्च-प्रभावी कार्यक्रमों में नियुक्ति और सेवामान्य दरों को भी ट्रैक किया जाता है।
  • कौशल सुधार सूचकांक: प्रशिक्षण पहले और बाद में तकनीकी और व्यवहारिक कौशल का परीक्षण (प्रवेश परीक्षा बनाम अंतिम परीक्षा)।
  • लिंग अनुपात: प्रशिक्षणार्थियों में महिलाओं की हिस्सा दर। इसको 50% के करीब लाना आदर्श है (जैसे PMGDISHA में महिलाओं का 54% प्रमाणन)।
  • उन्नयन और आय वृद्धि: प्रशिक्षित युवाओं की औसत आय में प्रशिक्षण पूर्व की तुलना में कितनी वृद्धि हुई।
  • संतुष्टि और फीडबैक: कोर्स को समाप्त करने वाले युवा, उनके नियोक्ता तथा परिवार का फीडबैक।
  • इंडस्ट्री साझेदारी: कितनी कंपनियों/नियोक्ताओं ने कोर्स को मान्यता दी या प्लेसमेंट में सहयोग किया।
  • तकनीकी साझेदारी: उपलब्ध प्रशिक्षकों, केंद्रों और संसाधनों की संख्या।

इन संकेतकों की निगरानी के लिए डेटाबेस बनाएं जहाँ नामांकन से लेकर भर्ती तक प्रत्येक चरण दर्ज हो। उदाहरणतः उच्‍च-प्रभावी मॉडल में “नामांकन → प्रमाणन → नियुक्ति → आय” तक डेटा ट्रैक किया जाता है। India Skills Report 2026 जैसे रिपोर्ट भी समय-समय पर युवाओं की रोजगारतज्ञता मापते हैं (इसमें युवा रोजगारतज्ञता 56.35% दर्ज हुई है)। ABBEP जैसे संगठन स्थानीय स्तर पर इन KPIs की निगरानी के लिए नियमित सर्वेक्षण, एलमुनाई नेटवर्क और पदोन्नति ऑडिट कर सकते हैं। इसके आधार पर कार्यक्रमों में निरंतर सुधार संभव है।

साझा करें: