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चिन्तन मन्थन

  • 22 February 22
  • Posted By : नरेन्द्र कुमार दीक्षित
  • जलेसर (एटा)

कविता

जब कठिन समय पर अपनों के,किरदार बदलते दिखते हों । और बात बात पर अपनों के ,व्यवहार बदलते दिखते हों । तो आवश्यक चिन्तन मन्थन है ,हुई भूल कहाँ कब कैसे क्यों ? यदि ईर्ष्याभाव और स्वार्थभाव ,उनके मन में नहीं पलते हों।।1 ---- नरेन्द्र कुमार दीक्षित ,जलेसर ।

  • Narendra Kumar Dixit ( June 13, 2022 at 06:06pm )

    आशीष बड़ों का लिये रहें,अनुभव से सीख सदा मिलती । करें पूछताछ कर काम यदी,तो होगी नहीं कभी गलती । कुछ समय बड़ों के साथ रहें,इसमें होगी ना तनिक क्षती। संघर्ष रहित अनुभव पाओ,सम्मान सहित करिये विनती।। इन बड़े बुजुर्गों की केवल,हो तुमही धरोहर धीर व्रती। वे नहीं करेंगे अहित कहीं,विश्वास करें सहकार मती । यदि परख करो तो कर लेना ,इतिहास में भूल हुईं महती। आगे जो होना होगा वह, विधना की होगी सतत गती।। ------- नरेन्द्र कुमार दीक्षित

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